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Wednesday, October 2, 2013

Tere Jaane Ke Baad



tere jaane ke baad
khaali kamre ko dekhte hein
teri nishani koi khojte hein
ek hair clip hi mili bas bohot tarsaane ke baad
tere jaane ke baad
aaine se rubaru hona kaafi der tak taalte hein
jo ho jaayein toh khud ko kai gaaliyan de daalte hein
rooth te hein kai baar khud ko manaane ke baad
tere jaane ke baad
sau dafa phone utha tere message ki raah takte hein
aadhi baji ghanti pe bhi poora jhapat-te hein
phir puraana koi message padh rakh dete hein phone muskuraane ke baad
tere jaane ke baad
laal aankhon pe chashma daalna tak yaad na rehta hai
uljhaane ko ungliyan ab kuch saath na rehta hai
suljhi hein ungliyan mann uljhaane ke baad
tere jaane ke baad
tere shampoo lipstick ki khushbuein jo hawa ho gayi hein
meri toh naak hi mujhse khafa ho gayi hai
ab khilegi phir voh zamaane ke baad
tere jaane ke baad
meri khurdhuri daadhi ki shikaayat ab kaun karega
mere kharchon mein kifayat ab kaun karega
ab kaun baat jaane dega mere jhoothe bahaane ke baad
tere jaane ke baad
ab ki baar tumhaari pasand ka filmy pyaar karenge
ab ki baar hum aankhon mein sadiyan paar karenge
aur phir main chal dunga saath sadiyan bitaane ke baad
tere jaane ke baad
tere jaane ke...

सिलवटें






माथो की हाथों की
रातों की जज़्बातों की
सिलवटें

कुछ बिस्तर की चादर पे
कुछ सामाजिक आदर पे
सिलवटें

आती हैं तेरे आने पे
सिर्फ़ मेरे सिरहाने पे
सिलवटें

कभी काँपते होठों पे उभरती
कभी खुलती पलकों में सिमटती
सिलवटें

कल के ख्वाब में
छलके आब में
सिलवटें

जगह जगह टूटी सी
सहलाने पे रूठी सी
सिलवटें

बेछोर कहीं कहीं नपी हुई
तन की मन में छपी हुई
सिलवटें

तेरे सपाट तलवों को चिढ़ाती
मुझसे तुझमें समाती
सिलवटें

सुबह की दुश्मन मेरी
शामों की उलझन मेरी
सिलवटें

सब कुछ सौंपा मुझे
तेरा वो तोहफा मुझे
सिलवटें

तेरी याद दिलाती वो
फर्श पे मुझे सुलाती वो
सिलवटें

कब तक ये दिल कटे
कब तक साहिल बटे
तरतीबी ये फिर हटे
फिर लौट आयें वो सिलवटें
फिर लौट आयें वो
सिलवटें

कलम मेरी कलम



कभी तो मेरी सोच से भी तेज़ भाग निकलती थी
आज मेरे मंसूबों से कहीं पिछड़ी सी है
जैसे झोले से यकायक ही जाग निकलती थी
आज तो उंगलियों से ही बिछड़ी सी है
कलम मेरी कलम
तुझसे यादों को लिखते थे
आज यादों में तुझे लिख रहे हम


कोई आवारा सा ख्याल कभी जो मिल जाता
तो उसे दबोचने तू झट से आ जाती
पर जब काम के लिए नाम देने का वक़्त आता
तो मेरी इज़्ज़त को तू खूब देर नाचती
तेरे खिलवाडों पे मुस्कुरा के सह जाते जाने कितने सितम
कलम मेरी कलम
तुझसे यादों को लिखते थे
आज यादों में तुझे लिख रहे हम

मैने तुझे चूमा चबाया दिल के पास रखा
किस्मत का ठेका भी आधा आधा बाटा
कहते हैं लोग की तुझे प्रेमिका से भी ख़ास रखा
ना रखता तो कोई प्रसंग शायद कभी रंग खिलाता
अब आज वो नही और तू भी नही और ना होंगे कल हम
कलम मेरी कलम
तुझसे यादों को लिखते थे
आज यादों में तुझे लिख रहे हम

तुझपे जान छिड़कता मैं तो तू भी मुझपे मरती थी
अब ना जाए क्यूँ तू बस रूठी रूठी सी रहती है
कितने वाकिये तो तू खुद ही लिख दिया करती थी
अब काग़ज़ पे थम कर स्याही का एक कुआँ सा बना देती है
फिर आके लिख जा चार शब्द की मिट जायें मेरे भरम
कलम मेरी कलम
तुझसे यादों को लिखते थे
आज यादों में तुझे लिख रहे हम


कलम मेरी कलम...

शायद कल



शायद कल नंगे पाँव के नीचे दूब कसमसाए, थोडा गुदगुदाए
शायद कल नहाते वक़्त नाक में पानी, आँखों में साबुन चला जाए

शायद कल गली में घूमते किसी आवारा पिल्ले को नाम मैं दे दूँ
शायद कल किसी और की बात को विराम मैं दे दूँ

शायद कल किराने से बचे छुट्टे पैसों का खजाना ही मिल जाए
शायद कल होमवर्क की छुट्टी का बहाना ही मिल जाए

शायद कल मैं शहर में नई कोई गली ही खोज लूँ
शायद कल मैं फिर खुद को सुपरमैन या ही-मैन ही सोच लूँ

शायद कल फिर किसी छोटी चोट पे बेंड-ऐड लगाईं जाए
शायद कल फिर पापा से नयी कोई टोफी मंगाई जाए

शायद कल फिर दोस्तों के साथ मनघडंत कोई कहानी बन जाए
शायद कल फिर देश प्रेम में सीना तन जाए

शायद कल फिर भाई की साइकिल से गली की रेस हो जाए
शायद कल फिर मम्मी के पल्लू में बहते आंसू खो जाएँ

शायद कल कॉपी में एक गुड कोई दे दे
शायद कल क्रीम वाला बिस्कुट कोई दे दे

शायद कल फिर परिवार पूरा चित्रहार देखने बैठे
शायद कल फिर पापा सर सहलाएं लेटे लेटे

शायद कल बीता हर वोह पल ही आ जाए
शायद वोह कल कल ही आ जाए

शायद...

Chamdi



chamda chamdi
daam mein damdi
jism ki bikri
waah befikri

apne bulbuley
soney mein tuley
dil mein neem ugey
munh mein mishri

bachpan pachpan
jee ki tadpan
sabka mol hai
paisa gol hai

ghumta firta
har jaib mein girta
imaan mein halka
bhaari tol hai

kisi maa ki behen ki
haalat kyun sahan ki
kya yahi padha tu
hua yunhi bada tu?

dimaag bhara hai
na dil hara hai
soch zara yeh
kahan khada tu

zindagiyon pe jeete
daanavon se peete
khoon khoob hein
yeh jo mehboob hein

bulbulon ko fodo
ab udna chodo
zameen chodke
sab ore doob hai

har jaan bikey jo
anjaan dikhe jo
na farak tumhe ho
ho baat yeh bisri

chamda chamdi
daam mein damdi
jism ki bikri
waah befikri

Chaar Shabd



jo chaar shabd main har pyaar ke naam likhta
toh shabdon mein piroyi anginat subah aur shaam likhta
naam ke naam pe mera hai hi kya abhi
varna tu galib ke baad mera hi naam likhta

pyaar mein dil yeh girta hi raha
main khumaari mein khushnumaai mein firta hi raha
yeh nasha likha upar waale ne mere haq mein
na likhta toh jaane kitne jaam likhta
jo chaar shabd....
kai bhulaane laayak vakiye the, bhula bhi gaye
kuch yaad mein reh gaye rula bhi gaye
kuch jagaaye rakhe kuch sula bhi gaye mujhe
raaton ka varna kya mukaam likhta
jo char shabd....
main pyaar mein padna chahta tha, pyaar mujh mein pad gaya
sudhaarte sudhaarte dilon ko yeh dil bigad gaya
koi sudhaarne ka dum toh bharta ek baar isey
naam uske main zaaydaad tamam likhta
jo chaar shabd...

silsila silsilon ka ab bhi zaari hai
dhai akshar mein teen duniya saari hein
bimaari ko bimaar ya bimaar ko bimaari hai kaun kahe
jaan pata toh hakeem koi toh aaraam likhta
jo char shabd...

छीटें भाग २-






पिछले पाँच मिनिट से पेन से हाथ चितरता बैठा हूँ मैं. सोचता हूँ की क्या लिखूं. पर सच कहूँ तो कुछ ज़हेन में ही नहीं आ रहा. ज़िंदगी के बारे में लिख-लिख के भी ऊब गया हूँ. प्यार? प्यार के बारे में लिखूं? होता ही नहीं है साला तो लिखूं क्या. कई बार लगता है शायद इसी वजह से ज़िंदगी में वो ख़ालीपन रह जाता है जो कैसे भी भर नहीं पा रहा है. कोई चाहिए शायद. यह मैने बात शुरू कर दी मेरे सांसारिक रूप की तरह. और व्यंगात्मक बात यह है की जब भी कुछ चाहने की बात करता हूँ, मेरे मन में ज़िंदगी को समझने, इसके अर्थ को समझने के विचार कौंध जाते हैं. शायद इसलिए क्योंकि मुझे लगता है की एक बार ज़िंदगी और अर्थ को समझ लिया तो चाहतों से सदा के लिए छुटकारा मिल जाएगा. सोचने में शॉर्टकट लगता है, पर शॉर्टकट तो तब जब कोई राह तो सूझे.


क्या है मेरे पास रात को वापस आने के लिए? लॅपटॉप, कुछ फिल्में, अकेलापन. कभी-कभी लगता है जैब में पैसे होते तो दुनियाभर में यारी-दोस्ती निभाता फिरता. कहाँ उठे, कहाँ लुड़के, किसे खबर. पर लगता है ज़िंदगी ने मेरे लिए कुछ और ही सोच रखा है. बस बताती नहीं है क्या.


खैर फिलहाल तो कुछ लक्ष्य रूपी चूसनी देकर चुप करा रखा है इसने मुझे. देखें एक बार इसका रस ख़त्म हो जाए तो फिर क्या होता है.


शुभ्रात्रि ज़िंदगी.

Saturday, March 24, 2012

रात

रात के बिछौने पे

कलह सिमट के सोई है

सन्नाटे की चादर में

ताज़ा एक पुकार सिसक के खोई है

और हाथ पकड़ कर रात ये

नये शैतानो को खीच बाहर लाई है

की कई बार चाँद को ढककर

इस रात ने राहें छुपाई हैं

ये रात तो है मायावी सी

ये आशिक़ों की भी है, रसीकों की भी

है ये चैन से सोने वालों की

और कुछ मेरे सरीकों की भी

इस रात में सेजें तपती भी हैं

शमशान की राख ठंडाती भी

है सपने बुनती रात यही

मुई सपनो से जगाती भी

और दिन से जुड़ी है दूर बहुत पर

जो सबकी है वो रात नहीं

सफेद जो दिन होता है सबका

काली हमबिस्तर सबके साथ नहीं

पर ये रात जो काली ना होती

तो रात ये साली ना होती

जो हाथ रात का कट जाता

तो दिन की ताली ना होती

तो रात ये फिर घिर आई है

जाने क्या रंग छुपाएगी

इन्सा को फिर झंझोड़ेगी

फिर कुत्तों को सहलाएगी

हूँ दास मैं तेरा हे रात हे रात

चलूँगा जहाँ ले जाएगी

एक अंधेरे पे तेरे ही तो भरोसा है

जिसमें कभी मेरी सोच भी खो जाएगी.

छीटें

एक पुरानी कॉपी हाथ लगी. मानो ख़ज़ाना ही हाथ लग गया हो. कुछ ऐसे पलों का ख़ज़ाना जो मुझे याद नहीं की मैने जिए हैं. तारीखों से मालूम हुआ की उसमें जो कुछ लिखा है वो सब मैने कॉलेज के अंत के कुछ दिनों अथवा उसके बाद के दिनों में लिखा था. पर सच कहूँ तो मुझे उसमें से कुछ भी लिखना याद नहीं. अच्छा लगा एक तीसरे आदमी के दृष्टिकोण से खुद को देखकर. खुद को यूँ समझने का अनुभव भी अद्भुत सा रहा. बस उसी जादूई कॉपी से जो कुछ मेरे हाथ लगा, उस गागर में से चुल्लू भर पानी के छीटें यहाँ मार रहा हूँ, यह स्पष्ट करते हुए की हालाँकि मुझे याद नहीं की मैने जो लिखा था वो क्यों अथवा कब लिखा था पर वह भी मैं था और आज उसे पढ़ अचरज करता यह भी मैं हूँ.


छीटें भाग १-

एक दूसरे का पीछा करते घड़ी के कांटें मुझे बीते कल से दूर ढकेले जा रहे हैं. आने वाले कल से ज़रा झिझकते हुए मुझे अपने जाने-पहचाने, मित्र रूपी भूत को अलविदा कहने का मौका भी नहीं मिल पाता. मैं हाथ बढ़ाया रह जाता हूँ उसकी ओर पर वो जाता ही दिखाई देता है. भविष्य अजनबी, वर्तमान परिचित मात्र और भूत ही मित्र या पहचाना होता है. एक ऐसा मित्र जिससे सीख तो सकते हैं पर उसके साथ समय व्यतीत नही कर सकते. करें भी तो कैसे, वो तो खुद ही बीता समय है.


खैर परिचित से अपरिचित की ओर बढ़ता मैं कल की सोच में इतना मग्न रहता हूँ की आज से बेख़बर हो जाता हूँ. कभी कभी तो लगता है आज कुछ होता ही नहीं. देख जो ना पाया हूँ इतने समय से.


मानव मूल को समझना चाहता हूँ मैं. शायद वहीं से मेरे सभी सवालों के जवाब मुझे मिलें. और दुनिया में कितना कुछ है देखने को. ऐसे ख़याल भी क्यों आते हैं भला मन में मेरे. है देखने को तो क्या? क्या मिलेगा उससे? क्या बदलेगा? क्यों इच्छायें, उत्सुकता, महत्वकाँषायें इत्यादि मन में घर बना लेती हैं? ऐसे में सोचता हूँ मानसिक तौर पे विक्षिप्त इंसान क्या सोचता होगा? क्या भूत भविष्य वो भी खोजता होगा?


एक बात यह भी है की मैने दुनिया को इंसानो की नज़रों से ही देखा है. दुनिया को दुनिया के तौर पे तो शायद देखा ही नहीं. हर एक चीज़ में एक मानवीय कोण आ ही जाता है. शायद यह मानव होने का ही एक हिस्सा है.


सोचता हूँ मैं कहाँ इन सब चीज़ों की फ़िक्र करता रहता हूँ और कहाँ दुनिया में लोगों को पर्यावरण, पैसे, घर, परिवार, बीमारियों इत्यादि की चिंताएं सताए रहती हैं. पर में सोचने के बारे में ज़्यादा सोचता नहीं. ज़िंदगी जैसी आती है वैसी ही जीता हूँ. मन में आया लिखना है तो लिख रहा हूँ, मन हटा तो कलम रख सोने चला जाऊँगा.


वैसे जहाँ तक आज, यानी की २२/०४/०९ की बात है, मैं अनुराग भोमिया, उमर २१ वर्ष २ महीनें, ज़िंदगी को लेकर, मेरे भविष्य को लेकर बिल्कुल अनिश्चित हूँ, दुनिया और इसके लोगों से बहुत चिढ़ा हुआ हूँ, भविष्य में सौफ़ीसदी खून करने वाला हूँ, मन की शांति चाहता हूँ और दुनिया घूमने का मन रखता हूँ, एक ही बार प्यार में पड़ा हूँ, आज भी घर को हर चीज़ से उपर रखता हूँ, माँस-मदिरा का सेवन करता हूँ, दिल से अच्छा हूँ और सबका भला चाहता हूँ और यह अच्छी तरह जानता हूँ की भविष्य में चाहे जैसे भी हो, बहुत बड़ा आदमी बनने वाला हूँ.


सोने का समय हो गया लगता है. कलम छोड़ रहा हूँ अभी के लिए, पर जल्द ही फिर उठाऊँगा.


_________________

भाग १ समाप्त.


मैं आज़ाद हूँ.

ना धर्मों के प्रपंचों में हूँ

ना कट्टर फसल की खाद हूँ

चूहों की दौड़ मे ना-शामिल हूँ

ना पहले हूँ ना बाद हूँ

ना गालियों से कुंठाता हूँ

ना मोहताज-ए-दाद हूँ

ना किसान का ब्याज हूँ

ना ही उपभोक्तावाद हूँ

अपवाद होने की चाह से दूर

खुद एक अपवाद हूँ

जो तुलनात्मक हो वो आज़ादी क्या

ना तुलनाओ में बर्बाद हूँ

मैं, मैं आज़ाद हूँ.


Bachche banein



Kuch der chavi se haath chudaayein,

Kuch der toh bande sachche banein,

Kuch der fikar ko samjhein hi na,

Kuch der akal ke kachche banein,

Chalo kisi ko jeebh chidhaayein,

Kyun sabke saamne achche banein,

Jo bade baney kya bada ukhada,

Kuch der ko phirse bachche banein

अजीब रात



वो रात भी अजीब थी

चंद तारों से ग़रीब थी

वो रूठी थी, मुझे कोसती थी

पर लेती मेरे करीब थी


चेहरों के आकार टुकड़ों में बनते थे

कुछ देर को लहरें थमती थी

कुछ देर दोनो उफनते थे

और काँचों में परछाईयाँ

ही जैसे बनी रक़ीब थी

वो रात भी अजीब थी


ना मिलने की कस्में-बातें उंगलियाँ उलझाए होती रही

वो मुझसे दूर जाती रही और मुझेमें ही खोती रही

और कहती रही की हर बात जो मीठी कहता था,

आज़माई हुई तरकीब थी

वो रात भी अजीब थी


ना प्यार था ना हवस, जो था, था वो बस

नशे के बादलों ने अंदर से कुछ बीना

घुमड़े, गरजे, गये बरस

बाकी की रात की वो बरसात ही जैसे नीव थी

वो रात भी अजीब थी


दुनिया से थोड़े तंग से, ना जानते एक दूसरे को ढंग से

बतियाते भी, कुंठाटे भी, बेपलंग, पर मलॅंग से

और करते भी क्या दोनो फिर, वो रात लिखी नसीब थी

वो रात भी अजीब थी

वो रात बड़ी अजीब थी

तुम आने वाली थी



मैने मन्नतें माँगी थी

मिन्नते की थी

तुमने वादा किया था

तुम आने वाली थी


तुम आने वाली थी तो मैं चुपके से एक बड़ी अलमारी भी पसंद कर आया था

और एक छोटा सा पलंग कि तुम कभी दूर ना रहो

तुम आने वाली थी और हम देसी थर्रा आज़माने का हमारा वादा पूरा करते

पीना छोड़ने पर भी मैं पीता की तुम मुझे बोर ना कहो

तुम आने वाली थी और हम मीडीया के हाथो खिंची 'लिव इन' की लकीरों में रंग भरते

और बस यूँ ही रहते रहते तुम रह ही जाती

तुम आने वाली थी और मैं दरवाज़े पे बैठ तुम्हारी राह देखने का अभ्यास अभी से ही करने लगा था

तुम ऑफीस वाली जो ठहरी, जाने रोज़ कितनी देर लगाती


तुम आने वाली थी पर जनवरी का महीना आ गया

सर्दी आ गयी चली भी गयी

मुझे बुखार भी आया तीन बार

पैसे आए उनका क्या करूँ

पर तुम तुम नही आई


तुम आती तो काटने को दौड़ती दीवारों से शायद फिर याराना हो जाता

तुम आती तो तुम्हारे मंगलवार के बहाने शायद फिर कभी मंदिरों में आना जाना हो जाता

तुम आती तो फिर स्याही पिघल कल्पना के आकार लेती

तुम आती तो फिर दिनचर्या मुझे ज़िंदगी सी दिखाई देती

तुम आती तो फिर बात ही क्या रह जाती

पर तुम तुम नही आई


आया एक फरमान की तुम ना आओगी

तुम्हारा वो एहसान की तुम ना आओगी

साल बाद कहा तो यह कहा

सुन पाए क्यूँ मेरे कान की तुम ना आओगी


तुम ना आई तो मेरे सब बदलाव फिर बदल गये

तुम ना आई तो कुछ साल ज़िंदगी के और फिसल गये

तुम ना आई तो तुम्हारे पापा भी अब ठीक लगते हैं

तुम ना आई तो मन के वेहम अब सटीक लगते हैं


तुम ना आई हो ना आओगी

कब तक मेरी ज़िंदगी से दौड़ लगाओगि

खैर मैं तो भावुक हूँ

मेरी बात दिल पे ना लेना

पर जीना इस बात के साथ

कभी भुला भी ना देना

की तुम आने वाली थी


Thursday, May 12, 2011

Yeh Shaam

teri dheemi si aawaaz mein yeh shaam bhi ruk ruk ke dhal rahi hai

chehre se latein hataane ko hi jaise yeh hawa tez chal rahi hai

yeh hilti daaliyan, chehchahaate pakshi, ittefaak nahi hein

tumhaari hansi ke intezaar mein ab kaaynaat machal rahi hai

kalko yeh na kehna ki ae dost tum beech baat hi uth chal diye

jaane do mujhe, ki ab iss dost ki bhi neeyat badal rahi hai

teri dheemi si aawaaz.....


kyun yeh chaandni aaj tere chehre pe hi aakar tik rahi hai

kyun aaj teri mehek ke aage raatraani bhi aadhe mol bik rahi hai

iss raat mein tu khoobsoorat lag rahi hai ya tujhmein yeh raat

aisi uljhan se meri zabaan har shabd pe ab sambhal rahi hai

teri dheemi si aawaaz...


mera marz bhi tu hai, dawa bhi tu, ilaaj karun toh main kaise karun

sadiyon puraani do dilon ki baat, aaj karun toh main kaise karun

ki dar ya jhemp se hoth nahi siley hein mere, ae dost

kya kahun jab soch hi teri yaadon mein tehel rahi hai

teri dheemi si aawaaz...

Bench

zindagi ki sadak pe hum bas yun hi ek bench pe sustaane ko ruke the

humein kya pata tha ki hum kismat ke kaidi ho chuke the


bagal mein aakar tum baithe aur humne gaur bhi na kiya

fir jo gaur kiya toh karte hi gaye, fir kuch aur bhi na kiya


kisi ko aham banana nahi chahte the kyunki khud vikalp banne se darte the

phir bhi na jaane kyun tumhein khila kar hi apna pait bharte the


khair humne kaha khud se ki lag gaye phir tum apni zindagi haathon se apne likhne

kahaa, ruk jaao. mat tayyiyaar raha karo muskuraahton ke mol bikne


par marammat karne koi aur aata dikhaai bhi toh na diya tha

anjaane raaston pe khaali bench ke lamhon ko kabhi humne bhi jiya tha


toh jo haath hum shaan se peeche baandhe tehla karte the, humne badhaaye

voh roothna manaana, raaton ko khana dhoondhte dhakke khana, voh pal bhi khoob bitaaye


jaanne ko jigyaasu, maine tumhe bhi khoob jana, khoob aur jaanna chaaha

tumne mujhe kabhi jaanna hi nahi chaaha, fir bhi 'mujhe khudgarzon se nafrat hai', maine kaha


kyun kaha kyunki main sant nahi hun, main ummeed, apeksha karta hun

main tumhein saalon dunga, par jab mujhe zaroorat ho toh tumhaare ek din ki ummed rakhta hun


tumne poocha mujhse, ki kyun itne achche vartaav ke saath tum mujh par meherbaan ho

maine jawab na diya. hota toh jawaab deta. badle mein maine khud se kaha ki jawaab do

maine fir jawaab....na diya.


chamatkaar hi toh tha, toh chamatkaar ko prashno ke ghere mein kyun daalna

aaj achcha hai toh aaj ko aaj jeelein, aaj hi kyun kal ki soch ko paalna


toh keelein ab humaari khatm ho chali thi, thi kutiya ab humaari marammat ko keelein maangti

vyang yeh hai, ki dard se ummeedein jaagti hein aur ummeedein hein aur dard baant-ti


voh din bhi aa gaya jab khudgarzi ke chaar paath hum bhi seekh baithe hein

jana ki hum uss daur mein aa gaye hein jahan club ke shor mein aap sunna nahi chahte hum jo kehte hein


kya tha kyun tha sab jaan pata toh achcha hota. thoda samay aur bitata toh achcha hota.

dekhne waale kehte hein ki bachkana hai yeh. kaash mein sachmuch bachcha hota


tumse duniya mein halaaki kuch hi din aage hun, par kaamna hai ki duniyadaari mein tum mujhse aage nikal jaao

mere uthne ke baad bench pe agla baithne wala koi kum paagal zyada practical sa saathi paao


jahan tak meri baat hai toh safar zaari rahega yun hi keelein juta-te lagaate huae

haan zindagi ki sadak pe phir shaayad kisi bench pe ab na milun mein sustaate huae


haath kheenchne ka sabak bhi zaroori tha, shukriya ada bhi na kar paya seekhane ke liye

zabaan ka pakka hun toh yeh hai tumhaare liye meri taraf se kavita, bench ke naye saathi ko dikhaane ke liye