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Saturday, March 24, 2012

छीटें

एक पुरानी कॉपी हाथ लगी. मानो ख़ज़ाना ही हाथ लग गया हो. कुछ ऐसे पलों का ख़ज़ाना जो मुझे याद नहीं की मैने जिए हैं. तारीखों से मालूम हुआ की उसमें जो कुछ लिखा है वो सब मैने कॉलेज के अंत के कुछ दिनों अथवा उसके बाद के दिनों में लिखा था. पर सच कहूँ तो मुझे उसमें से कुछ भी लिखना याद नहीं. अच्छा लगा एक तीसरे आदमी के दृष्टिकोण से खुद को देखकर. खुद को यूँ समझने का अनुभव भी अद्भुत सा रहा. बस उसी जादूई कॉपी से जो कुछ मेरे हाथ लगा, उस गागर में से चुल्लू भर पानी के छीटें यहाँ मार रहा हूँ, यह स्पष्ट करते हुए की हालाँकि मुझे याद नहीं की मैने जो लिखा था वो क्यों अथवा कब लिखा था पर वह भी मैं था और आज उसे पढ़ अचरज करता यह भी मैं हूँ.


छीटें भाग १-

एक दूसरे का पीछा करते घड़ी के कांटें मुझे बीते कल से दूर ढकेले जा रहे हैं. आने वाले कल से ज़रा झिझकते हुए मुझे अपने जाने-पहचाने, मित्र रूपी भूत को अलविदा कहने का मौका भी नहीं मिल पाता. मैं हाथ बढ़ाया रह जाता हूँ उसकी ओर पर वो जाता ही दिखाई देता है. भविष्य अजनबी, वर्तमान परिचित मात्र और भूत ही मित्र या पहचाना होता है. एक ऐसा मित्र जिससे सीख तो सकते हैं पर उसके साथ समय व्यतीत नही कर सकते. करें भी तो कैसे, वो तो खुद ही बीता समय है.


खैर परिचित से अपरिचित की ओर बढ़ता मैं कल की सोच में इतना मग्न रहता हूँ की आज से बेख़बर हो जाता हूँ. कभी कभी तो लगता है आज कुछ होता ही नहीं. देख जो ना पाया हूँ इतने समय से.


मानव मूल को समझना चाहता हूँ मैं. शायद वहीं से मेरे सभी सवालों के जवाब मुझे मिलें. और दुनिया में कितना कुछ है देखने को. ऐसे ख़याल भी क्यों आते हैं भला मन में मेरे. है देखने को तो क्या? क्या मिलेगा उससे? क्या बदलेगा? क्यों इच्छायें, उत्सुकता, महत्वकाँषायें इत्यादि मन में घर बना लेती हैं? ऐसे में सोचता हूँ मानसिक तौर पे विक्षिप्त इंसान क्या सोचता होगा? क्या भूत भविष्य वो भी खोजता होगा?


एक बात यह भी है की मैने दुनिया को इंसानो की नज़रों से ही देखा है. दुनिया को दुनिया के तौर पे तो शायद देखा ही नहीं. हर एक चीज़ में एक मानवीय कोण आ ही जाता है. शायद यह मानव होने का ही एक हिस्सा है.


सोचता हूँ मैं कहाँ इन सब चीज़ों की फ़िक्र करता रहता हूँ और कहाँ दुनिया में लोगों को पर्यावरण, पैसे, घर, परिवार, बीमारियों इत्यादि की चिंताएं सताए रहती हैं. पर में सोचने के बारे में ज़्यादा सोचता नहीं. ज़िंदगी जैसी आती है वैसी ही जीता हूँ. मन में आया लिखना है तो लिख रहा हूँ, मन हटा तो कलम रख सोने चला जाऊँगा.


वैसे जहाँ तक आज, यानी की २२/०४/०९ की बात है, मैं अनुराग भोमिया, उमर २१ वर्ष २ महीनें, ज़िंदगी को लेकर, मेरे भविष्य को लेकर बिल्कुल अनिश्चित हूँ, दुनिया और इसके लोगों से बहुत चिढ़ा हुआ हूँ, भविष्य में सौफ़ीसदी खून करने वाला हूँ, मन की शांति चाहता हूँ और दुनिया घूमने का मन रखता हूँ, एक ही बार प्यार में पड़ा हूँ, आज भी घर को हर चीज़ से उपर रखता हूँ, माँस-मदिरा का सेवन करता हूँ, दिल से अच्छा हूँ और सबका भला चाहता हूँ और यह अच्छी तरह जानता हूँ की भविष्य में चाहे जैसे भी हो, बहुत बड़ा आदमी बनने वाला हूँ.


सोने का समय हो गया लगता है. कलम छोड़ रहा हूँ अभी के लिए, पर जल्द ही फिर उठाऊँगा.


_________________

भाग १ समाप्त.


मैं आज़ाद हूँ.

ना धर्मों के प्रपंचों में हूँ

ना कट्टर फसल की खाद हूँ

चूहों की दौड़ मे ना-शामिल हूँ

ना पहले हूँ ना बाद हूँ

ना गालियों से कुंठाता हूँ

ना मोहताज-ए-दाद हूँ

ना किसान का ब्याज हूँ

ना ही उपभोक्तावाद हूँ

अपवाद होने की चाह से दूर

खुद एक अपवाद हूँ

जो तुलनात्मक हो वो आज़ादी क्या

ना तुलनाओ में बर्बाद हूँ

मैं, मैं आज़ाद हूँ.


Bachche banein



Kuch der chavi se haath chudaayein,

Kuch der toh bande sachche banein,

Kuch der fikar ko samjhein hi na,

Kuch der akal ke kachche banein,

Chalo kisi ko jeebh chidhaayein,

Kyun sabke saamne achche banein,

Jo bade baney kya bada ukhada,

Kuch der ko phirse bachche banein

अजीब रात



वो रात भी अजीब थी

चंद तारों से ग़रीब थी

वो रूठी थी, मुझे कोसती थी

पर लेती मेरे करीब थी


चेहरों के आकार टुकड़ों में बनते थे

कुछ देर को लहरें थमती थी

कुछ देर दोनो उफनते थे

और काँचों में परछाईयाँ

ही जैसे बनी रक़ीब थी

वो रात भी अजीब थी


ना मिलने की कस्में-बातें उंगलियाँ उलझाए होती रही

वो मुझसे दूर जाती रही और मुझेमें ही खोती रही

और कहती रही की हर बात जो मीठी कहता था,

आज़माई हुई तरकीब थी

वो रात भी अजीब थी


ना प्यार था ना हवस, जो था, था वो बस

नशे के बादलों ने अंदर से कुछ बीना

घुमड़े, गरजे, गये बरस

बाकी की रात की वो बरसात ही जैसे नीव थी

वो रात भी अजीब थी


दुनिया से थोड़े तंग से, ना जानते एक दूसरे को ढंग से

बतियाते भी, कुंठाटे भी, बेपलंग, पर मलॅंग से

और करते भी क्या दोनो फिर, वो रात लिखी नसीब थी

वो रात भी अजीब थी

वो रात बड़ी अजीब थी

तुम आने वाली थी



मैने मन्नतें माँगी थी

मिन्नते की थी

तुमने वादा किया था

तुम आने वाली थी


तुम आने वाली थी तो मैं चुपके से एक बड़ी अलमारी भी पसंद कर आया था

और एक छोटा सा पलंग कि तुम कभी दूर ना रहो

तुम आने वाली थी और हम देसी थर्रा आज़माने का हमारा वादा पूरा करते

पीना छोड़ने पर भी मैं पीता की तुम मुझे बोर ना कहो

तुम आने वाली थी और हम मीडीया के हाथो खिंची 'लिव इन' की लकीरों में रंग भरते

और बस यूँ ही रहते रहते तुम रह ही जाती

तुम आने वाली थी और मैं दरवाज़े पे बैठ तुम्हारी राह देखने का अभ्यास अभी से ही करने लगा था

तुम ऑफीस वाली जो ठहरी, जाने रोज़ कितनी देर लगाती


तुम आने वाली थी पर जनवरी का महीना आ गया

सर्दी आ गयी चली भी गयी

मुझे बुखार भी आया तीन बार

पैसे आए उनका क्या करूँ

पर तुम तुम नही आई


तुम आती तो काटने को दौड़ती दीवारों से शायद फिर याराना हो जाता

तुम आती तो तुम्हारे मंगलवार के बहाने शायद फिर कभी मंदिरों में आना जाना हो जाता

तुम आती तो फिर स्याही पिघल कल्पना के आकार लेती

तुम आती तो फिर दिनचर्या मुझे ज़िंदगी सी दिखाई देती

तुम आती तो फिर बात ही क्या रह जाती

पर तुम तुम नही आई


आया एक फरमान की तुम ना आओगी

तुम्हारा वो एहसान की तुम ना आओगी

साल बाद कहा तो यह कहा

सुन पाए क्यूँ मेरे कान की तुम ना आओगी


तुम ना आई तो मेरे सब बदलाव फिर बदल गये

तुम ना आई तो कुछ साल ज़िंदगी के और फिसल गये

तुम ना आई तो तुम्हारे पापा भी अब ठीक लगते हैं

तुम ना आई तो मन के वेहम अब सटीक लगते हैं


तुम ना आई हो ना आओगी

कब तक मेरी ज़िंदगी से दौड़ लगाओगि

खैर मैं तो भावुक हूँ

मेरी बात दिल पे ना लेना

पर जीना इस बात के साथ

कभी भुला भी ना देना

की तुम आने वाली थी


Thursday, May 12, 2011

Yeh Shaam

teri dheemi si aawaaz mein yeh shaam bhi ruk ruk ke dhal rahi hai

chehre se latein hataane ko hi jaise yeh hawa tez chal rahi hai

yeh hilti daaliyan, chehchahaate pakshi, ittefaak nahi hein

tumhaari hansi ke intezaar mein ab kaaynaat machal rahi hai

kalko yeh na kehna ki ae dost tum beech baat hi uth chal diye

jaane do mujhe, ki ab iss dost ki bhi neeyat badal rahi hai

teri dheemi si aawaaz.....


kyun yeh chaandni aaj tere chehre pe hi aakar tik rahi hai

kyun aaj teri mehek ke aage raatraani bhi aadhe mol bik rahi hai

iss raat mein tu khoobsoorat lag rahi hai ya tujhmein yeh raat

aisi uljhan se meri zabaan har shabd pe ab sambhal rahi hai

teri dheemi si aawaaz...


mera marz bhi tu hai, dawa bhi tu, ilaaj karun toh main kaise karun

sadiyon puraani do dilon ki baat, aaj karun toh main kaise karun

ki dar ya jhemp se hoth nahi siley hein mere, ae dost

kya kahun jab soch hi teri yaadon mein tehel rahi hai

teri dheemi si aawaaz...

Bench

zindagi ki sadak pe hum bas yun hi ek bench pe sustaane ko ruke the

humein kya pata tha ki hum kismat ke kaidi ho chuke the


bagal mein aakar tum baithe aur humne gaur bhi na kiya

fir jo gaur kiya toh karte hi gaye, fir kuch aur bhi na kiya


kisi ko aham banana nahi chahte the kyunki khud vikalp banne se darte the

phir bhi na jaane kyun tumhein khila kar hi apna pait bharte the


khair humne kaha khud se ki lag gaye phir tum apni zindagi haathon se apne likhne

kahaa, ruk jaao. mat tayyiyaar raha karo muskuraahton ke mol bikne


par marammat karne koi aur aata dikhaai bhi toh na diya tha

anjaane raaston pe khaali bench ke lamhon ko kabhi humne bhi jiya tha


toh jo haath hum shaan se peeche baandhe tehla karte the, humne badhaaye

voh roothna manaana, raaton ko khana dhoondhte dhakke khana, voh pal bhi khoob bitaaye


jaanne ko jigyaasu, maine tumhe bhi khoob jana, khoob aur jaanna chaaha

tumne mujhe kabhi jaanna hi nahi chaaha, fir bhi 'mujhe khudgarzon se nafrat hai', maine kaha


kyun kaha kyunki main sant nahi hun, main ummeed, apeksha karta hun

main tumhein saalon dunga, par jab mujhe zaroorat ho toh tumhaare ek din ki ummed rakhta hun


tumne poocha mujhse, ki kyun itne achche vartaav ke saath tum mujh par meherbaan ho

maine jawab na diya. hota toh jawaab deta. badle mein maine khud se kaha ki jawaab do

maine fir jawaab....na diya.


chamatkaar hi toh tha, toh chamatkaar ko prashno ke ghere mein kyun daalna

aaj achcha hai toh aaj ko aaj jeelein, aaj hi kyun kal ki soch ko paalna


toh keelein ab humaari khatm ho chali thi, thi kutiya ab humaari marammat ko keelein maangti

vyang yeh hai, ki dard se ummeedein jaagti hein aur ummeedein hein aur dard baant-ti


voh din bhi aa gaya jab khudgarzi ke chaar paath hum bhi seekh baithe hein

jana ki hum uss daur mein aa gaye hein jahan club ke shor mein aap sunna nahi chahte hum jo kehte hein


kya tha kyun tha sab jaan pata toh achcha hota. thoda samay aur bitata toh achcha hota.

dekhne waale kehte hein ki bachkana hai yeh. kaash mein sachmuch bachcha hota


tumse duniya mein halaaki kuch hi din aage hun, par kaamna hai ki duniyadaari mein tum mujhse aage nikal jaao

mere uthne ke baad bench pe agla baithne wala koi kum paagal zyada practical sa saathi paao


jahan tak meri baat hai toh safar zaari rahega yun hi keelein juta-te lagaate huae

haan zindagi ki sadak pe phir shaayad kisi bench pe ab na milun mein sustaate huae


haath kheenchne ka sabak bhi zaroori tha, shukriya ada bhi na kar paya seekhane ke liye

zabaan ka pakka hun toh yeh hai tumhaare liye meri taraf se kavita, bench ke naye saathi ko dikhaane ke liye


kahani ek carpenter ki

ek carpenter tha..matlab badhai..kaam mein achcha..duniya ko lekar uljha hua..bas uski ek hi buraai thi..logon ke gharon ki marammat karne nikal padhta tha..koi na bhi maange toh bhi agar usey dikhta ki marammat ki zaroorat hai toh marammat kar bina mol liye chal deta..ab mol toh leta nahi tha..toh keelein kahan se aati?..toh apni hi kutiya ki keelein nikaal kar duniya bhar ke ghar jodta tha..aaj keelon ke abhaav mein uski kutiya dhahne ko hai..voh sochta hai ki koi badhai uski duniya ki marammat karne bhi aayega..par har kahani pariyon ki kahani toh nahi hoti.


isliye apni keelein bacha ke rakho.

High Tales

hazy blues and reds and greens

ages spent in momentary scenes

the rides on the rainbow never disappoint

the 2D worlds are adjacent and joint

oh and the scary clowns jump on water

the sun melts in the sea till its left only quarter

her face, it shimmers in the flashes of reality

clearer than the reality around

or the mind made towns

the animal families, the perfect symmetry

skipping thoughts skipping worlds i am free

i make mold unhold memories

the stages are formed and we dance on trapeze

and I follow the non existing trails

such is the world of the high tales

Tuesday, October 12, 2010

दिल विराना



मैं अकेला दिल विराना

और हरामी सारा ज़माना

और टूटे भी अब दिल कितना

टुकड़ों का अब क्या चूरन बनाना


ये गया वो गया

चला गया हर कोई

निर्दोष यह आँखें मेरी

न रोई न सोयी


दोष किसका न समझा में अब तक

तोह खोट खुद में ही ढूंढता फिरा

कुछ तो बात होगी जो में

हर पगडण्डी पे चलता गिरा


क्या तू सही है

क्या मैं सही हूँ

क्या सब वाही है

क्या मैं वाही हूँ


खैर तू जो गया है

तो मैं खुद को देख पाया हूँ

तो में दुनिया से

व्योम में अब आया हूँ


दिल अब आराम से ज़रा

इस दुनिया में चलना-चलाना

मैं अकेला दिल विराना

और हरामी सारा ज़माना

मैंने राम को नहीं देखा

मैंने राम को नहीं देखा
नहीं देखा मैंने उसके काम को
मैंने देखा है तो बस
उसके नाम पे होते हराम को

देखा है मैंने लोगों को घृणा में जलते हुए
देखा है उन्‍हें अज्ञान की कोख में पलते हुए
मैंने प्‍यार के अंजाम को नहीं देखा
मैंने राम को नहीं देखा

क्‍या राम चाहेगा किसी की इमारत गिरे
क्‍या राम चाहेगा कि धर्म के नाम दिल चिरें
मैंने ऐसे इंतजाम को नहीं देखा
मैंने राम को नहीं देखा

क्‍या राम का रावण से धर्म का युद्ध था?
क्‍या राम का मन हिंदुत्‍व से अशुद्ध था?
मैंने रामायण में भी ऐसे कत्‍लेआम को नहीं देखा
मैंने राम को नहीं देखा

राम कब पैदा, कहां हुआ, किसे पता
पर इसी बात पर फोकटियों का झट्ठा बटा
ऐसी यात्राओं के मैंने मुकाम को नहीं देखा
मैंने राम को नहीं देखा

देश को खून की कड़ाही में तलते हैं
जो अपने भगवानों के नारे दिये चलते हैं
मैंने ऐसे तकिया-कलाम को नहीं देखा
मैंने राम को नहीं देखा भाई
मैंने राम को नहीं देखा

मैंने देखा लोगों का खून बहते
मांओं को बच्‍चों के मरने का गम सहते
राजनेताओं की जेबें भरते
एक आम हिंदू-मुसलमान को अपने घर में डरते
क्‍यूं न लड़ूं मैं इनके लिए जो मेरे सामने सांस लेते हैं
क्‍यों मैं जपूं राम नाम जिसकी लोग मन में आस लेते हैं
जो रोक न सका इतने बेगुनाह लोगों को तड़पने से
मैंने उस भगवान को नहीं देखा
मैंने राम को नहीं देखा।

झरोखे



जहाँ देखता हूँ वहाँ झरोखे हैं

कुछ में सच्चाई तो कुछ में धोखे हैं


झरोखों की भी अपनी बात निराली है

जैसे निर्दयी दीवारों में थोड़ी उम्मीद की जगह खाली है


किसी में चचा जान तो किसी में छोटू खड़ा है

कि जैसे झरोखे रूपी मुख से, घर दुनिया से बोल पड़ा है


झरोखों से झरोखे भर ज़िंदगियाँ देखना मुझे खूब लुभाता है

मन हर झरोखे के पीछे बनती कहानियों का अंदाज़ा लगाता है


कहीं से छलकती हरी दीवारें कहीं गुलाबी पर्दे क्या कुछ कहते हैं

कुछ के नीचे लेनदार तो कुछ के नीचे आशिक़ रहते हैं


कहीं से कलह का शोर, तो कहीं से मंद संगीत छनकर आता है

गुज़रता राहगीर अंजाने ही दिन भर वो धुन गुनगुनता है


झरोखों में झलकती जीवन की विविधता सुहानी है

मानो इस पोस्टर के बिना बाकी फिल्म ही बेमानी है


फिर आँखों के झरोखों से मॅन को ताकना

मॅन के झरोखे से जीवन को ताकना


और बैठ झरोखों पे आने वालों की बाट जोहना

अंदर-बाहर के गम-खुशी में खो,

कभी खिलखिलाना कभी बिलख के रोना


रोज़मर्रा के बायोस्कोपे यह अनोखे हैं

अनंत बढ़ती दीवारों को यही तो रोके हैं

अनायास ही मेरे जिग्यासु मन को क्यूँ यह टोके हैं

जहाँ देखता हूँ वहाँ झरोखे हैं

इत्र-तड़कों के शीतल झोके हैं

अब बंद दरवाज़ों के पीछे पलते समाज के

प्रतिबिंब के यही तो चन्द मौके हैं


जहाँ देखता हूँ वहाँ झरोखे हैं

कुछ में सच्चाई तो कुछ में धोखे हैं


Friday, May 28, 2010

Kaid.



















tu kaid mein teri kaid hai
mein hun meri kaid mein
kabhi ujaala ghere hai
kabhi andheri kaid mein

kaid hai duniya saari
taraha taraha ki kaid mein
hai aazaadi humaari
bewajah ki kaid mein

kahin kangaali ki kaid
kahin paison ki kaid hai
bade-badon ki kaid hai
aise-vaison ki kaid hai

insaan bilon mein kaid hai
bhagwaan dilon mein kaid hai
raahi kaid hein raahon mein
aur manjeelon mein kaid hein

koi kaid hai bahari duniya mein
koi andar apne kaid hai
kahin sapne kaid baney baithe hein
kahin khud hi sapne kaid hein

aur aazadi saapeksh hai
kaidon ke paimaano mein
jailor-kaidee ek se
aaye-gaye jamaano mein

sukh ki dukh ki kaidon mein
ranj-o-pyaar ki kaidon mein
kaidee bhooley kaidee hona
is sansaar ki kaidon mein

jo sansaar ki kaid taajey hai
moksh ki kaid talaashey hai
kaidon mein kaid dhoondhtey
hum aazaadi ke pyaase hein

kaidon mein ummeed kaidon ki hai
bas kaidon ka janjaal hai
jo samjha voh nihaal
na samjha voh behaal hai

kaidon ka sammohan hai
sammohan ki kaid hai
bas kahey aur kya kehne wala
apne apne mann ki kaid hai

Yeh duniya agar mil bhi jaaye toh kya hai.


duniya ke aseem anant is sagar mein
brahmaan ki adni si is gagar mein
jab baadhon ka bharosa na koi hai ab
toh naav pohonch saahil bhi jaaye toh kya hai
yeh duniya agar mil bhi jaaye toh kya hai

duniya bhar ki vaadiyon ki kaamna kyun karun
bageechon mein kaliyon ki gaadiyon ki kaamna kyun karun
jhulasti vadiyon ke kaantein bhare bageechon mein
kahin ek kali khil bhi jaaye toh kya hai
yeh duniya agar mil bhi jaaye toh kya hai

faulaadi iraadon ka kya fayda
duniyaa badalne ke vaadon ka kya fayda
jab imaan hi doley huein yahan sab ke
toh ek-aadh pahad hil bhi jaaye toh kya hai
yeh duniya agar mil bhi jaaye toh kya hai

asli toh yeh duniya yun bhi nahin
pata nahi mein asli hun ki nahin
aise mein chamtkaron ka bhi mulya kahan
mom se paththar chil bhi jaaye toh kya hai
yeh duniya agar mil bhi jaaye toh kya hai

sabhi toh yahan jhoota khaa rahe hein
paavitra raag par alaape jaa rahe hein
toh kuch maukon par daavat chodna theek toh nahi
khana zara sil bhi jaaye toh kya hai
yeh duniya agar mil bhi jaaye toh kya hai

shreshtam pashu hone ke jashn bade hein
shrishti vijay dhwaj hum liye khade hein
kaafi choohey hein yahan jab mahamaari failaney ko
toh sher dubak bil bhi jaaye toh kya hai
yeh duniya agar mil bhi jaaye toh kya hai

toh kya hai yahan koi sochta nahi
ichchaon ke aage koi pohonchta nahi
jab jeevn fikr ka paryay ban chuka hai
toh kuch der lag kahin dil bhi jaaye toh kya hai
yeh duniya agar mil bhi jaaye toh kya hai

Go.

show me the pain
the tears if u have
freeze one if you may
the red on your face
always from rage
cry tears of blood
and paint it red
heartless i am not
only if i could see
the pain you've got
words are just words
sounds assigned meanings
i would have been better off deaf
give me real
inherent meanings
be human
don't just act like one.
well you should go.
go.